जलियांवाला बाग हत्याकांड उधम सिंह कहानी

आप सभी जानते है हमारे भारत देश में एक अंग्रेज अधिकारी बहुत कुख्यात और बहुत क्रूर आ गया था जिसका नाम था डायर।
अमृत शहर में उसकी पोस्टिंग हो गई थी और उसने एक रोलेक्ट एक्ट रोलेक्ट नाम का कानून बना दिया था तो उस रोलेक्ट एक्ट के विरोध में 14 अप्रैल उन्नीस सौ 1919 को जलियावाला बाग में बड़ी सभा हुई थी जिसमें 25 हजार लोग शामिल हुए थे। उस बड़ी सभा पर डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। आप अंदाजा लगा सकते हैं अगर आप में से किसी भाई ने और बहन ने पुलिस में नौकरी की हो या सेना में नौकरी की हो तो इस बात का अंदाजा उनको बहुत अच्छे से लगेगा। 15 मिनट के अंदर। एक हजार 650 राउंड गोलियां चलाई थी डायर 15 मिनट के अन्दर एक हजार 650 राउंड गोलियां चली थी और तीन हजार से ज्यादा क्रांतिकारी वहीं तड़प तड़प कर मर गए थे। आप में से जिन लोगों ने अमृतसर देखा है जलियावाला बाग देखा है आपको मालूम होगा की जलियांवाला बाग के घुसने के लिए और निकलने के लिए एक ही दरवाजा है।
चारों तरफ से वो चारदीवारी से घिरा हुआ है और दरवाजा भी मुश्किल से चार साढ़े चार पांच फुट का है। उस दरवाजे पर डायर ने तोप लगा दी थी आके ताकि कोई निकल के भागने न पाए और जलियांवाला बाग में कुआं है बल्कि दो कुएं हैं अंधे कुंए के रूप में जाने जाते हैं अंधाधुंध जब एक हजार 650 राउंड 16 सौ पचास राउंड गोलियां चली तो जो गोलियों के शिकार हुए वो तो वहीं पे में शहीद हो गए। जो बच गए उन्होंने जान बचाने के लिए कुएं में छलांग लगाई और कुआं लाशों से पट गया। मृत शरीरों से पट गया और 15 मिनट तक अंधाधुंध गोलियां चलाकर हंसते हुए खिलखिलाते हुए डायर वहां से चला गया। रास्ते में जाते हुए अमृतसर की सड़कों के दोनों तरफ जो भी भारतीय नागरिक कुछ को मिला उनको गोलियां मारकर पीछे तोप के मुंह से रस्सी से बांधकर घसीट कर वो लेके गया था इसका इनाम उसको अंग्रेजों की संसद की तरफ से मिला था शाबाशी मिली थी उसकी पदोन्नति हुई थी उसका प्रमोशन हुआ था और उसको भारत से लंदन भेज दिया गया था और बड़े पदों पर ऊधम सिंह उसी हत्याकाण्ड के समय लोगों के बीच में शामिल थे।
पर आप जानते हैं कि उनकी उमर मुश्किल से उस समय 11 12 साल की हुआ करती थी तो उस हत्याकाण्ड के समय जब वो शामिल थे और उन्होंने अपनी आँखों से देखा तो उन्होंने संकल्प लिया था। और संकल्प उनका ये था कि जिस डायर ने क्रूरता के साथ। मेरे देश के नागरिकों की हत्या की है इस डायर को मैं नहीं छोडूंगा ये मेरे जीवन का आखिरी संकल्प है और इस संकल्प को पूरा करने के लिए आपको एक बात और मालूम है की शहीदे आजम उधम सिंह की कि घर से एकदम गरीब थे। माता पिता का साया उठ चुका था। अनाथाश्रम में बड़े हुए थे पलकर माता पिता साथ में नहीं थे दोनों मर चुके थे। बड़े भाई थे उनकी मृत्यु हो चुकी थी किसी बीमारी से अपने परिवार में वो अकेले रह गए थे और उनके पास आर्थिक संसाधन कुछ नहीं थे। तो जब उन्होंने योजना बनाई डायर को मारने की संकल्प पहले ले लिया और योजना बनाई तो लंदन जाना है।
लंदन जाने के लिए पैसे चाहिए पैसे कहां से आएंगे तो उन्होंने तय किया कि मैं किसी के सामने हाथ फैलाऊं से अच्छा है मैं मेहनत मजदूरी करके पैसे कमाओ तो उन्होंने कारपेंटरी का काम सीखा ये लकड़ी का काम जिसको हम कहते और लकड़ी का काम करते करते इतने पैसे जमा किए कि अमरीका गए। फिर अमरीका से लंदन पहुँच कर लंदन पहुंच गए फिर एक होटल में काम किया। पानी पिलाने का। ताकि कुछ पैसे इकट्ठे हों। और।
बंदूक खरीदी जा सके पिस्तौल खरीदी जा सके और ये सब काम करके करते। शहीदे आजम उधम सिंह को आप जानते 21 साल लग गए। उन्नीस सौ उन्नीस में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। उन्नीस सौ चालीस में जाकर उन्होंने अपना संकल्प पूरा कर पाया था।
21 साल वो। पैसों के लिए परिश्रम के साथ कहीं न कहीं अपने जीवन को लगाते हुए संकल्प के लिए जिन्दा थे। 21 साल के बाद उन्नीस सौ चालीस में किंगसन एक जगह है लंदन में किंग्स्टन पैलेस। वहां पर जब डायर का एक बड़ा कार्यक्रम हो रहा था और उसको मालाएं पहनाई जा रही थी और उसका सम्मान किया जा रहा था।
उस कार्यक्रम में उधम सिंह पहुंचे थे और अपनी जेब से रिवाल्वर निकालकर तड़ातड़ तीन गोलियां मारी थीं और तीन गोलियां मारकर एक ही वाक्य कहा था कि आज मैंने 21 साल पहले का मेरा संकल्प पूरा किया है और मैं अब इसके बाद एक मिनट जिन्दा नहीं रहना चाहता। एक मिनट भी जिन्दा नहीं रहना है अब मेरे दिल की इच्छा पूरी हुई है तो रिवाल्वर को अंग्रेज अधिकारी के सामने जब उन्होंने सौंपा तो अंग्रेज अधिकारी के हाथ कांप रहे थे उसको ये लगता था कि ये मुझे भी नहीं मार देगा तो उधम सिंह का घबराओ मत मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है।
मेरी तो डायर से दुश्मनी थी जिसने मेरे देश के तीन हजार लोगों को मारा। क्रान्तिकारियों का इतना ऊँचा आदर्श कि जो संकल्प लिया है उसी की पूर्ति के लिए जीवन लगा देना है।उसमें दस साल लगे पंद्रह साल लगे। बीस साल लगे।21 साल लगे यह शहीदे आजम उधम सिंह को |